प्रभाष परंपरा न्यास पर अंबरीश के सवाल
प्रभाष जोशी को सही मायने भी तभी याद किया जा सकता है जब दिल्ली से लेकर दूर दराज के इलाकों में मीडिया को बाजार की ताकत से मुक्त करते हुए वैकल्पिक मीडिया के लिए ठोस और नया प्रयास हो .भाषा के नए प्रयोग की दिशा में पहल हो और प्रभाष जोशी के अधूरे काम को पूरा किया जाए. पर यह सब काम उस गिरोहबंदी और खेमेबंदी से नही होने वाला जिसकी शुरुवात दिल्ली में कुछ पेशेवर लोगो ने की है की है. प्रभाष जोशी देश के अकेले पत्रकार थे जिन्होंने देश के कोने कोने में काम करने वाले पत्रकारों से सम्बन्ध बनाया और निभाया.
आवारा बंजारा में अंबरीश कुमार प्रभाष परंपरा की रचनात्मक पहल शुरू!
प्रभाष जोशी को सही मायने भी तभी याद किया जा सकता है जब दिल्ली से लेकर दूर दराज के इलाकों में मीडिया को बाजार की ताकत से मुक्त करते हुए वैकल्पिक मीडिया के लिए ठोस और नया प्रयास हो .भाषा के नए प्रयोग की दिशा में पहल हो और प्रभाष जोशी के अधूरे काम को पूरा किया जाए. पर यह सब काम उस गिरोहबंदी और खेमेबंदी से नही होने वाला जिसकी शुरुवात दिल्ली में कुछ पेशेवर लोगो ने की है की है. प्रभाष जोशी देश के अकेले पत्रकार थे जिन्होंने देश के कोने कोने में काम करने वाले पत्रकारों से सम्बन्ध बनाया और निभाया.
आवारा बंजारा में अंबरीश कुमार प्रभाष परंपरा की रचनात्मक पहल शुरू!
क्या यही है प्रभाष परंपरा ? आलोक तोमर जिस हालत में है हो सकता है उसमे वे ज्यादा कुछ न बोले ,सुप्रिया जिस मनोदशा में है, वे भी टाल जाए पर उनकी ख़ामोशी से मामला रुकेगा नहीं .
देश के दूरदराज इलाको में ,जिलों और कस्बों ,पत्रकारिता की मशाल जलाने वाले साथियों ,मानवाधिकार से लेकर जल जंगल जमीन के लिए संघर्ष करने वाले साथियों से इस मुद्दे पर जो समर्थन मिला है उसके हम आभारी है.
बिगुल में राजकुमार सोनी - प्रभाष परम्परा की आड़ में
विरोध में यही पोस्ट रिपीट हुई है
संजीव नामक एक लेखक ने अंबरीश कुमारजी की निष्टा पर कुछ सवाल भी उठाए हैं। श्री तिवारी ने कहा है कि अंबरीश कुमार जी अपना विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें ट्रस्ट से जोड़ा नहीं गया। संजीव से मेरा सीधा कोई परिचय तो नहीं है लेकिन उनके आरोप निजी दुश्मनी से भरे-पूरे दिखते हैं। जहां तक मेरी जानकारी में है ट्रस्ट में कुछ ऐसे लोगों ने कब्जा जमा लिया है जिनका विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। ये लोग अवसर की विचारधारा को महत्व देते रहे हैं। अब भले ही कोई कह दे कि नामवर सिंह जैसा नाम भी न्यास से जुड़ा है तो यह बताने की जरूरत नहीं कि नामवर सिंह का प्रगतिशील लेखक संघ किस दशा और दिशा से गुजर रहा है। इस संघ के एक अध्यक्ष प्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन ने पिछले दिनों यह कहकर ही इस्तीफा दे दिया था कि प्रलेस भटकाव के रास्ते पर हैं। श्री रंजन ने यह इस्तीफा तब दिया था जब रायपुर के डीजीपी विश्वरंजन ने प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के बैनर तले लेखकों की चाट-पकौड़ी नामक एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। कुल मिलाकर मेरे कहने का यह आश्य है कि जब संघ, ट्रस्ट या न्यास की पवित्रता में पाखंड का प्रवेश हो जाता है तब सारे सही उद्देश्य प्लास्टिक के नाडे़ से ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं। एक न्यास से यदि जनसंघी जुड़े हैं, वामपंथी भी और काशीराम की पार्टी के सदस्य भी तो फिर उस न्यास का क्या होगा यह बताने की जरूरत नहीं है। न्यास में जो खून-खराबा होने वाला है वह अभी से दिख रहा है। दिल्ली के पत्रकार तो यह हैंडिंग लगाएंगे नहीं.. कस्बाई पत्रकारों को ही कहीं किसी छोटे से पर्चे में लिखना होगा- प्रभाष परम्परा न्यास में रणवीर सेना ने किया खून-खराबा।
प्रभाष परंपरा न्यास पर विधवा विलाप बंद करो
फिर भी अंबरीश कुमार जैसे जनसत्ताइट पत्रकारों को यह भला कैसे बर्दाश्त होगा कि उन प्रभाष जोशी के नाम पर कुछ काम आगे बढ़ रहा है जिनकी कमाई वे खा रहे हैं. यह सब लिखकर कीचड़ उछालने से अच्छा होता कि ऐसा ही कोई आयोजन वे लखनऊ में करते. प्रभाष जोशी पत्रकारिता में किसी की बपौती नहीं है. कोई भी नहीं है जो उनके ऊपर अपनी मोहर लगाकर गिरवी रखने का दावा कर सके. खुद उनके दोनों बेटे भी नहीं. अंबरीश कुमार अपनी सदिच्छा व्यक्त करते हुए कहते हैं- “प्रभाष जोशी को सही मायने में तभी याद किया जा सकता है, जब दिल्ली से लेकर दूरदराज के इलाकों में मीडिया को बाजार की ताकत से मुक्त करते हुए वैकल्पिक मीडिया के लिए ठोस और नया प्रयास हो। भाषा के नये प्रयोग की दिशा में पहल हो और प्रभाष जोशी के अधूरे काम को पूरा किया जाए।” तो करिए? आपको किसी ने रोक रखा है क्या? अगर अंबरीश कुमार इस दिशा में काम नहीं करते हैं तो प्रभाष परंपरा न्यास पर सवाल उठाना सिवाय विधवा विलाप के और कुछ नहीं है.
अपने इस पोस्ट की चर्चा जनोक्ति.कॉम के स्तम्भ "ब्लॉग-हलचल" में जरुर देखें !
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